इमाम हुसैन ने दुनिया को दिया तौहीद, सब्र व इंसानियत का पैगाम।
जुमा की तकरीर में बयां हुई कर्बला की दास्तां
सैय्यद फरहान अहमद
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।
पहली मुहर्रम से शुरु हुआ जिक्रे शुहदाए कर्बला की महफिलों का दौर तीसरी मुहर्रम को भी जारी रहा। ‘शुहदाए-कर्बला’ का जिक्र सुन सबकी आंखें नम रहीं। शहर की एक दर्जन से ज्यादा मस्जिदों व घरों में कर्बला की दास्तान सुनी और सुनाई जा रही है। गोरखनाथ, रहमतनगर, तुर्कमानपुर आदि मोहल्ले के युवा रोजा रख कर अल्लाह की इबादत कर रहे हैं। वहीं मस्जिदों में जुमा की तकरीर में इमाम हुसैन व शुहदाए कर्बला की जिंदगी व शिक्षाओं पर रोशनी डाली गई।
मदरसा दारूल उलूम हुसैनिया दीवान बाजार में मौलाना महमूद रजा कादरी की ओर से जिक्रे शुहदाए कर्बला महफिल हुई। जिसमें मुफ्ती-ए-शहर अख्तर हुसैन मन्नानी ने कहा कि शुहदाए कर्बला ने दुनिया को तौहीद, सब्र व इंसानियत का एक अजीम पैगाम दिया है। जिसे रहती दुनिया तक नहीं भुलाया जा सकता। कर्बला की जंग दुनिया की पहली इंतिहाई बेरहम जालिमाना कार्रवाई थी। जिसमें शहीद हुए लोगों में छह माह के बच्चे से लेकर 78 साल के बुर्जुग शामिल थे। इमाम हुसैन शहीद तो हो गए लेकिन दुनिया वालों को बता गए की दीन-ए-इस्लाम सब्र व शहादत से फैला। इसके लिए कुर्बानियां दी गईं।
तीसरी मुहर्रम को मकतब इस्लामियात चिंगी शहीद इमाम चौक तुर्कमानपुर में हाफिज रहमत अली निजामी व कारी मुहम्मद अनस नक्शबंदी ने कहा कि मुसलमानों पर हजरत अली, हजरत फातिमा, हजरत हसन व हजरत हुसैन से मुहब्बत करना वाजिब है। हम हजरत इमाम हुसैन की कुर्बानी को नहीं भूल सकते। पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने नवासे इमाम हुसैन की पैदाइश के साथ ही आपके शहादत की खबर दे दी थी। हजरत अली, हजरत फातिमा जहरा, हजरत हसन और खुद इमाम हुसैन भी जानते थे कि एक दिन कर्बला के मकाम पर शहीद किया जाऊंगा, लेकिन किसी ने भी और खुद हजरत इमाम हुसैन ने भी कभी किसी किस्म का शिकवा जुबान पर नहीं लाया, बल्कि सब्र के साथ अपनी शहादत की खबर सुनते रहे।
सुन्नी बहादुरिया जामा मस्जिद रहमतनगर में मौलाना अली अहमद ने कहा कि हदीस में है कि पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया मुझे हजरत जिब्राइल ने खबर दी कि इमाम हुसैन को तफ (कर्बला) में शहीद किया जाएगा। हजरत जिब्राइल मेरे पास वहां की मिट्टी लाए और मुझसे बताया कि यह हुसैन के शहादत गाह की मिट्टी है। तफ करीबे कूफा उस स्थान का नाम है जिसको कर्बला कहते हैं। हदीस में आया है कि वह मिट्टी उम्मुल मोमिनीन हजरत उम्मे सलमा के पास मौजूद रही। वह फरमाती हैं कि मैंने उस सुर्ख मिट्टी को एक शीशी में रख दिया जो हजरत इमाम हुसैन की शहादत के दिन खून हो गई। इसी तरह अन्य मस्जिदों व घरों में जिक्रे शुहदाए कर्बला महफिल हुई। अंत में सलातो सलाम पढ़कर मुल्क में अमन ओ अमान और भाईचारे की दुआ मांगी गई।