कुर्बानी अल्लाह की कुर्बत का जरिया - सैयद मोहम्मद क़ादरी
- किसी नेकी के नतीजे में दूसरों को तकलीफ पहुंचे तो उसकी रूह मुतास्सिर होने लगती है।
जयपुर. राजस्थान।
ईदुल अज़हा की पूर्व संध्या पर यहां एक अहम विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें बकरीद यानि ईद-उल-अज़हा से संबंधित दीनी व दुनियावी बातों पर विस्तार से चर्चा हुई। वहीं उलेमा-ए-दीन ने मुस्लिम समाज से ईदुल अज़हा के मुबारक मौके पर कुर्बानी के साथ ही अन्य नसीहतें एवं व्यवहारिकता को अमल में लाने का आह्वान किया।
मुख्य वक्ता सैयद मोहम्मद क़ादरी ने कहा-कुर्बानी महज एक रस्म नहीं, बल्कि बंदा-ए-मोमिन के जज्बा-ए-इतात, ईसार और कुर्ब-ए-इलाही की रौशन निशानी है। यह वह मुकद्दस अमल है जिसमें इंसान अपनी महबूब चीज को रजा-ए-खुदावंदी के लिए पेश करके अपनी बंदगी का ऐलान करता है। मगर इबादत की रूह सिर्फ नियत के इखलास में नहीं, बल्कि उसके असरात में भी छिपी होती है। अगर किसी नेकी के नतीजे में दूसरों के लिए तकलीफ, परेशानी या मुश्किल पैदा होने लगे, तो उसकी रूह मुतास्सिर होने लगती है। कुर्बानी चूंकि अल्लाह की कुर्बत का जरिया है, इसलिए उसमें ऐसा कोई पहलू शामिल नहीं होना चाहिए जो खल्क-ए-खुदा के लिए रंज और तकलीफ का सबब बने।
वे बोले-अफसोस कि ईद-उल-अजहा के दिनों में हमारी गलियां और रास्ते इबादत की खूबसूरती के बजाय बदइंतजामी और तकलीफ की तस्वीर बन जाते हैं। रास्ते, जो लोगों की सहूलत और आने-जाने के लिए बनाए गए हैं, कन्नातों और रुकावटों से बंद कर दिए जाते हैं। जानवरों को सड़कों पर दौड़ाया जाता है, शोर-ओ-गुल मचाया जाता है और कुर्बानी के बाद ओझड़ी, खून और आलाइशें लंबे समय तक रास्तों में पड़ी रहती हैं। इससे बदबू फैलती है, माहौल गंदा होता है और राहगीरों को परेशानी होती है। जबकि कुर्बानी अल्लाह की रजा के लिए है, न कि उसके बंदों को तकलीफ पहुंचाने के लिए।
तकलीफ देने वाली चीजों को रास्ते से हटाएं
सुन्नी दावते इस्लामी के निगरां सैयद मोहम्मद क़ादरी ने कहा-इस्लाम ने रास्तों के हुकूक को बहुत अहमियत दी है। सरवर-ए-कायनात ने रास्ते को इंसानी तहजीब और अखलाक का आईना करार दिया। सहीह मुस्लिम की रिवायत में रास्ते के पांच हक बयान किए गए हैं-नजरें झुका कर रखना, किसी को तकलीफ न पहुंचाना, सलाम का जवाब देना, नेकी की तरफ बुलाना और बुराई से रोकना। गौर कीजिए, इन सभी शिक्षाओं का उद्देश्य इंसानियत को राहत, अहतराम और भलाई है। एक और हदीस-ए-मुबारका में ईमान की शाखों का जिक्र करते हुए हुजूर अक़्दस सल्ललाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया कि ईमान का सबसे ऊंचा दर्जा ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ का इकरार है, जबकि सबसे निचला दर्जा रास्ते से तकलीफ देने वाली चीज को हटाना है। यानी इस्लाम के नजदीक रास्ते को साफ रखना और लोगों की आसानी का ख्याल रखना भी ईमान की निशानी है।
सफाई और भलाई के कार्य करें
सैयद मोहम्मद कादरी बोले-जामे तिर्मिजी की रिवायत इस अहसास-ए-इंसानियत को और भी विस्तार से बताती है; भूले हुए को रास्ता बताना, अंधे को सहारा देना, रास्ते से पत्थर, कंटा या हड्डी हटाना और अपने बर्तन से दूसरे के बर्तन में पानी डाल देना भी सदका है। ये शिक्षाएं हमें बताती हैं कि इस्लाम का मिजाज राहत पहुंचाना, सफाई और भलाई है, न कि लापरवाही और तकलीफदेह रवैया।
गंदगी की फौरन सफाई करना भी इबादत का हिस्सा
मौलाना सैयद मोहम्मद कादरी ने कहा-यह बात जेहन में रहनी चाहिए कि कुर्बानी से पहले रास्तों को खुला रखना, गुजरगाहों को बहाल करना और कुर्बानी के बाद आलाइशों और गंदगी की फौरन सफाई करना भी इसी इबादत का हिस्सा है। इबादत वही मुकम्मल है जिससे रब राजी हो और बंदा-ए-खुदा भी राहत महसूस करे। कुर्बानी की खूबसूरती सिर्फ जानवर जिबह करने में नहीं, बल्कि इस अहसास में है कि हमारे अमल से किसी राहगीर को परेशानी न हो और न किसी इंसान को तकलीफ पहुंचे।