चरवाहा विद्यालय दरबार का अस्तित्व खतरे में।
भवन की स्थिति जर्जर, भूमि पर कृषि विभाग ने जमाया अपना कब्जा।
विद्यालय से सटे अनावाद सर्वसाधारण भूमि पर भूमिहीनों का कब्जा।
ग्रामीणों ने सीओ से अतिक्रमण मुक्त करने की लगाई गुहार।
रिपोर्ट :विनोद विरोधी
गया, बिहार।
समाज के वंचित समुदाय के बच्चों को अध्ययन के लिए वर्ष 1990 के दशक में बनाए गए चरवाहा विद्यालय दरबार का अस्तित्व इन दोनों खतरे में है। जिले के बाराचट्टी प्रखंड अंतर्गत दरबार गांव स्थित कृषि विभाग के भवन में इस विद्यालय की नींव रखी गई थी।तब विद्यालय के लिए 36 डिसमिल भूमि आवंटित की गई थी। विडंबना है कि जैसे-जैसे सूबे में शासन सत्ता का खेल बनता बिगड़ गया, वैसे-वैसे इस विद्यालय के अस्तित्व पर भी संकट मंडराता रहा। वर्तमान समय में जो दो कमरों में उक्त विद्यालय के द्वारा प्राथमिक शिक्षा मुहैया कराई जा रही है, उसकी छतें काफी जर्जर हो चुकी है।बरसात के मौसम में भवन की छतों से पानी टपकता है जिससे कमरे पानी से भर जाते हैं। बगल में एक सामुदायिक भवन है जिसमें किसी तरह बच्चों के लिए मध्यान भोजन बनता है ।वही विद्यालय के लिए आवंटित की गई जमीन को भी कृषि विभाग अपने अधीन में ले रखा है, जिससे बच्चों को खेलने कूदने के लिए भी मुश्किल हो गया है। वर्तमान में इस विद्यालय में कुल 83 बच्चे नामांकित हैं। कृषि विभाग द्वारा विद्यालय की भूमि को अपने अधीन कर लेने, विद्यालय की भवन की स्थिति जर्जर होने व कोई अनहोनी घटना की आशंका के मद्देनजर स्थानीय ग्रामीणों ने एक अनावाद सर्वसाधारण भूमि को चरवाहा विद्यालय के नए भवन के निर्माण हेतु चिन्हित किया है। जिसका खाता संख्या 134 खेसरा संख्या345 है, जो मुनीलाल मांझी नामक एक महादलित के घर के सामने है। ग्रामीण बताया कि उक्त भूमि के अगल-बगल अनाबाद सर्वसाधारण खाता से ही संबंधित प्लॉट नंबर 341व 353 की भूमि है,जिसमें कुछ अंश को चरवाहा विद्यालय के परिसर में शामिल किया जा सकता है। इस सिलसिले में स्थानीय जनप्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों व ग्रामीणों ने अंचल अधिकारी बाराचट्टी को एक आवेदन देकर इंगित भी किया है। किंतु इस भूमि पर विडम्बना है कि चंद्र लोगों ने अतिक्रमण कर रखा है, जिससे प्रशासन के द्वारा अतिक्रमण मुक्त करने की भी गुहार लगाई गई है। ताकि चरवाहा विद्यालय के भवन का निर्माण सुगमता से शीघ्र हो सके। अब देखना है कि इस प्रक्रिया में शिक्षा विभाग व उसके अधिकारियों का कितना योगदान होता है? बच्चों का भविष्य कितना उज्जवल हो पाएगा अथवा यूं ही अधर में लटक कर रह जाएगा फिलहाल कहना मुश्किल है?