भूखों को खाना खिलाएं और दूसरों को भी प्रेरित करें : हाफिज रहमत अली
सूरह माऊन यतीमों व गरीबों के प्रति दयालुता दिखाने का संदेश देती है : अनस नक्शबंदी
तुर्कमानपुर, नौरंगाबाद व जाफरा बाजार में दर्स-ए-कुरआन
सैय्यद फरहान अहमद
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।
मदरसा रजा-ए-मुस्तफा तुर्कमानपुर, जामिया अल इस्लाह एकेडमी नौरंगाबाद गोरखनाथ व सब्जपोश हाउस मस्जिद जाफरा बाजार में इस्लामी भाईयों व बहनों के लिए साप्ताहिक दर्स-ए-कुरआन (व्याख्यान) के तहत मुख्य वक्ता हाफिज रहमत अली निजामी ने सूरह माऊन की व्याख्या की। उन्होंने बताया कि सूरह अल-माऊन पवित्र कुरआन के 30वें पारे में स्थित 107वीं सूरह है। जिसमें कुल 7 आयतें हैं। इस सूरह का नाम इसके आखिरी शब्द "अल-माऊन" पर रखा गया है, जिसका अर्थ होता है "रोजमर्रा के इस्तेमाल की छोटी-छोटी चीजें या आम जरूरत की वस्तुएं"। यह सूरह मानव समाज में नैतिक मूल्यों, इबादत में ईमानदारी और गरीबों-अनाथों के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाने वाली एक बेहद महत्वपूर्ण सूरह है। यह सूरह उन लोगों की कड़ी निंदा करती है जो यतीमों और गरीबों को दुत्कारते हैं। यह सूरह स्पष्ट करती है कि सच्चे मोमिन का यह कर्तव्य है कि वह भूखों को खाना खिलाए और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करे। सूरह में उन नमाजियों के लिए चेतावनी है जो अपनी नमाजों के प्रति लापरवाह हैं और केवल लोगों को दिखाने के लिए इबादत करते हैं। यह सूरह सिखाती है कि केवल शारीरिक रूप से इबादत करना काफी नहीं है, दिल में अल्लाह का खौफ और नियत में सच्चाई होनी चाहिए।
विशिष्ट वक्ता कारी मुहम्मद अनस नक्शबंदी ने बताया कि सूरह माऊन पाखंड से बचने और अनाथों व गरीबों के प्रति सच्ची दयालुता दिखाने का संदेश देती है। यह सूरह सिखाती है कि केवल इबादत करना काफी नहीं है, बल्कि व्यावहारिक जीवन में इंसानियत और परोपकार भी जरूरी है। यह सूरह उन लोगों को चेतावनी देती है जो केवल लोगों को दिखाने के लिए नमाज पढ़ते हैं और अपनी इबादतों के प्रति लापरवाह रहते है। जो लोग अनाथों के साथ सख्ती से पेश आते हैं या उनके अधिकार छीनते हैं, और गरीबों को खाना खिलाने के लिए दूसरों को प्रोत्साहित नहीं करते, उनकी निंदा की गई है। 'माऊन' का मतलब पानी, नमक या कोई भी छोटी चीज है जो पड़ोसी एक-दूसरे से मांगते हैं। यह सूरह उन लोगों को गलत ठहराती है जो ऐसी छोटी मदद करने से भी मना कर देते हैं। इस्लाम में अच्छे पड़ोसी होने और रोजमर्रा की जरूरतों में एक-दूसरे का हाथ बटाने को सीधे तौर पर ईमान से जोड़ा गया है।
अंत में दुरूद ओ सलाम पढ़कर मुल्क में अमन शांति व भाईचारे की दुआ मांगी गई। दर्स-ए-कुरआन में मुजफ्फर हसनैन रूमी, आसिफ महमूद, नेहाल अहमद, अली अहमद, सैयद रऊफ वारसी, हाजी फैज अहमद, जावेद, रूशान, जीशान, आयशा खातून, शीरीन आसिफ, आसिफ, तानिया अख्तर, शिफा खातून, बेलाल अहमद, सना फातिमा, फिजा खातून, शालिबा, मुबस्सिरा, आस्मा खातून, नूरजहां, फिजा खातून, सानिया, अदीबा सहित तमाम इस्लामी भाईयों व बहनों की सहभागिता रही।