अगर ख़ुदा नहीं है तो ज़ुल्म भी ग़लत नहीं, जावेद अख़्तर के सवाल पर नास्तिकता की बुनियादी हार - सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी
*अल्लाह पर उठाया गया सवाल ही, अल्लाह के वजूद का सबसे बड़ा अक़्ली सबूत बन गया*
भारत समाचार न्यूज एजेंसी
गोरखपुर, उत्तरप्रदेश।
ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने मशहूर शायर व लेखक जावेद अख़्तर द्वारा अल्लाह के वजूद पर उठाए गए सवाल को आधार बनाते हुए नास्तिक सोच पर इस्लामी दृष्टिकोण से करारा बौद्धिक प्रहार किया है। उन्होंने कहा कि जावेद अख़्तर का सवाल, “अगर अल्लाह है तो दुनिया में ग़रीबी, ज़ुल्म, क़त्ल और अन्याय क्यों?” दिखने में अल्लाह के इंकार की दलील लगता है, लेकिन हक़ीक़त में यही सवाल, अल्लाह के वजूद की सबसे मज़बूत दलील बन जाता है।
*अगर अल्लाह नहीं, तो ‘ज़ुल्म’ भी ग़लत नहीं।
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि सबसे बुनियादी सवाल यह है कि अगर कोई अल्लाह नहीं, कोई आख़िरत नहीं, कोई जवाबदेही नहीं तो फिर ज़ुल्म को ज़ुल्म कहने का हक़ किसे है? नास्तिक नज़रिया दुनिया को महज़ ताक़त की लड़ाई मानता है। जहां जो ताक़तवर है वही सही है। ऐसी सोच में न फ़िरौन ग़लत है, न हिटलर, न किसी मज़लूम की चीख़ का कोई अर्थ। लेकिन जावेद अख़्तर हों या कोई भी नास्तिक, जब वह ज़ुल्म पर ग़ुस्सा करता है, अन्याय को ग़लत कहता है तो वह अनजाने में एक ऐसे नैतिक क़ानून को मान लेता है जो इंसान ने नहीं बनाया और नैतिक क़ानून हमेशा क़ानून देने वाले को साबित करता है। यही अल्लाह है। अल्लाह का न होना इंसाफ़ को मज़ाक बना देता है। उन्होंने कहा कि अगर मौत के बाद कोई हिसाब नहीं, तो दुनिया के करोड़ों मज़लूम, जिन्हें कुचल दिया गया। उनका इंसाफ़ कभी होगा ही नहीं। ऐसी सोच में इंसाफ़ सिर्फ़ नारा है और नैतिकता सिर्फ़ व्यक्तिगत पसंद। इस्लाम साफ़ कहता है। यह दुनिया इंसाफ़ की अदालत नहीं, बल्कि इम्तिहान की जगह है। पूरा इंसाफ़ एक तय दिन पर होगा।
*अल्लाह ने इंसान को मजबूर नहीं, ज़िम्मेदार बनाया।
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने स्पष्ट किया कि अल्लाह ने इंसान को चुनने की आज़ादी दी है। अगर इंसान मजबूर होता, तो न इनाम का अर्थ रहता और न सज़ा का। अच्छाई का मूल्य तभी है, जब बुराई चुनने की ताक़त मौजूद हो। रोबोट नेक नहीं होते, क्योंकि उनके पास चुनाव नहीं होता। नास्तिकता सवाल तो करती है, जवाब नहीं देती। उन्होंने कहा कि जावेद अख़्तर का सवाल भावनात्मक है लेकिन नास्तिकता के पास उसका कोई अंतिम जवाब नहीं। जबकि इस्लाम कहता है। अल्लाह देख रहा है, मोहलत दे रहा है और आख़िरकार पूरा हिसाब लेगा। इसीलिए दुनिया में ज़ुल्म का होना, अल्लाह के न होने की दलील नहीं, बल्कि इस बात की गारंटी है कि एक दिन हर ज़ालिम को जवाब देना होगा।
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि अल्लाह का इंकार ज़ुबान से किया जा सकता है लेकिन ज़ुल्म के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा करके, इंसान दिल से अल्लाह को मान लेता है। उन्होंने कहा कि जावेद अख़्तर का सवाल, दरअसल पूरी नास्तिक सोच का प्रतिनिधि है और यही सवाल साबित करता है कि अल्लाह के बिना न इंसाफ़ बचता है, न नैतिकता, न इंसानियत।