अल्लाह की मर्जी के मुताबिक जिंदगी गुजारना इबादत - कारी अनस नक्शबंदी
चालीस हदीसों की विशेष कार्यशाला।
सैय्यद फरहान अहमद
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।
शनिवार को जाफरा बाजार में इस्लामी भाईयों के लिए चालीस हदीसों की विशेष कार्यशाला सब्जपोश हाउस मस्जिद में आयोजित की गई। कार्यशाला के 11वें सप्ताह में पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बातचीत करने का तरीका बताया गया। वहीं अल्लाह की इबादत के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला गया।
मुख्य वक्ता कारी मुहम्मद अनस नक्शबंदी ने कहा कि पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बातचीत करने का तरीका शांत, सम्मानजनक, अत्यंत प्रभावशाली, सरल और विनम्र था। आप बहुत स्पष्ट रूप से बात करते। शब्दों के बीच ठहराव देते ताकि सुनने वाला उसे आसानी से समझ सके और याद रख सके। आपकी बातचीत संक्षिप्त लेकिन अर्थपूर्ण होती। आप फालतू बातों से बचते और कम शब्दों में गहरी बात कह देते। आप हमेशा मुस्कुराकर और नरमी से बात करते। यदि कोई महत्वपूर्ण बात होती, तो आप उसे तीन बार दोहराते ताकि वह अच्छी तरह समझ में आ जाए। आप कभी किसी को बुरा-भला नहीं कहते। आप हमेशा दूसरों को ध्यान से सुनते, बच्चों और बड़ों, अमीर गरीब सभी के साथ शिष्टाचार का पालन करते, और मुश्किल सवालों के जवाब भी शालीनता से देते, जिससे एक स्वस्थ और सामंजस्यपूर्ण संबंध बनते, जो कि आपकी सुन्नत का हिस्सा है जिसे हमें अपनाना चाहिए। जटिल सवालों के भी आप स्पष्ट और सटीक जवाब देते, जिससे बात आसानी से समझ आती थी। आपकी बातचीत का लहजा हमेशा सकारात्मक और सकारात्मक प्रभाव डालने वाला होता। पैगंबर-ए-इस्लाम की बातचीत करने का तरीका न केवल रहनुमाई का बड़ा माध्यम है, बल्कि वह लोगों के दिलों को जोड़ने और उन्हें नैतिक मूल्यों की ओर ले जाने का एक शक्तिशाली तरीका है। आपकी गुफ्तगू अल्लाह के संदेश का प्रचार करने, मानवता को सही रास्ता दिखाने और नैतिक मूल्यों को स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण तरीका है।
उन्होंने कहा कि अल्लाह की इबादत का मतलब सिर्फ नमाज, रोजा, जकात और हज ही नहीं, बल्कि हर वो नेक काम करना है जो अल्लाह की रजा के लिए किया जाए, जैसे दुआ करना, शुक्र अदा करना, अल्लाह का जिक्र करना और दिल व जिस्म के सभी अंगों से उसकी इबादत करना, जिसमें अल्लाह से डरना, मोहब्बत करना, और उसके बताए रास्ते पर चलना शामिल है, ताकि बंदा अल्लाह के करीब हो सके और उसकी रहमतें पा सके। अल्लाह की नेमतों पर शुक्र अदा करना, यह भी एक बड़ी इबादत है। अल्लाह पर भरोसा करना और उससे डरना, ये दिल की इबादतें हैं। इबादत का मकसद अल्लाह की मोहब्बत हासिल करना, उसके करीब जाना, और उसकी रहमतों को पाना है, ताकि इंसान अपने जीवन के हर पल में अल्लाह को याद रखे और उसकी मर्जी के मुताबिक जिए। इस्लाम में किसी भी काम को अगर अल्लाह को खुश करने की नियत से किया जाए, तो वह इबादत बन जाता है। इस्लाम में अल्लाह की इबादत का अर्थ केवल प्रार्थना करना नहीं, बल्कि अपनी पूरी जिंदगी को अल्लाह की मर्जी के मुताबिक गुजारना है। दिन में पांच बार अल्लाह को याद करना और उसके सामने झुकना, रमजान के महीने में भूखा-प्यासा रहकर आत्म-संयम सीखना, अपनी संपत्ति का एक निश्चित हिस्सा गरीबों और ज़रूरतमंदों को देना, सामर्थ्य होने पर जीवन में एक बार मक्का शरीफ जाकर हज करना, अल्लाह का जिक्र करना और हर जरूरत के लिए उसी से दुआ मांगना इबादत है। इसके अलावा माता-पिता की सेवा, परिवार का ख्याल रखना, सच बोलना, ईमानदारी से व्यापार करना और दूसरों की मदद करना भी अल्लाह की इबादत का हिस्सा है।
अंत में दुरूद ओ सलाम पढ़कर मुल्क में अमन ओ अमान की दुआ मांगी गई। कार्यशाला में हाफिज रहमत अली निजामी, मुजफ्फर हसनैन रूमी, आसिफ महमूद, आसिफ, शहबाज सिद्दीकी, ताबिश सिद्दीकी, शीराज सिद्दीकी, महबूब आलम, मुहम्मद आजम, अली सब्जपोश, सैयद नदीम अहमद, याकूब, रूशान, जावेद सहित तमाम लोग मौजूद रहे।
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