अल्लाह व रसूल का जिक्र आध्यात्मिक शांति और सुकून देता है - मुफ्ती अख्तर हुसैन
कुरआन-ए-पाक पढ़ें , समझें और उसके मुताबिक अमल करें : अनस नक्शबंदी
चालीस हदीसों की विशेष कार्यशाला का समापन।
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।
जाफरा बाजार में इस्लामी भाईयों के लिए चालीस हदीसों की विशेष कार्यशाला सब्जपोश हाउस मस्जिद में आयोजित की गई। कार्यशाला के अंतिम सप्ताह में अल्लाह के जिक्र की अहमियत व कुरआन-ए-पाक के बारे में विस्तार से बताया गया।
मुख्य वक्ता मुफ्ती-ए-शहर अख्तर हुसैन मन्नानी ने कहा कि अल्लाह व रसूल का स्मरण (जिक्र) व्यक्ति को अल्लाह के करीब लाता है।आध्यात्मिक शांति और सुकून देता है। तनाव कम करता है। हृदय को शुद्ध करता है। शैतान से बचाता है। दुनिया व आखिरत में सफलता दिलाता है। कुरआन-ए-पाक में खुद जिक्र (स्मरण) पर बहुत जोर दिया गया है। जिक्र एक शक्तिशाली आध्यात्मिक अभ्यास है जो व्यक्ति को अल्लाह से जोड़ता है, उसे आध्यात्मिक और मानसिक रूप से मजबूत बनाता है और उसे दुनिया व आखिरत में कामयाबी दिलाता है। अल्लाह व रसूल का जिक्र एक आवश्यक इबादत है जो अल्लाह व रसूल के साथ रिश्ते को मजबूत करती है। जिससे नेकी का रास्ता खुलता है। जितना अधिक आप अल्लाह को याद करते हैं, उतना ही आप उसके करीब आते हैं, जिससे प्रेम और भक्ति बढ़ती है। अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया है कि अल्लाह का जिक्र करने वाले लोगों को फरिश्ते घेर लेते हैं, उन पर रहमत उतरती है और अल्लाह उनका जिक्र करता है, जो कामयाबी का जरिया है। जिक्र अल्लाह का धन्यवाद करने और उसकी नेमतों के लिए शुक्रगुजार होने का आधार है।
विशिष्ट वक्ता कारी मुहम्मद अनस नक्शबंदी ने कहा कि कुरआन-ए-पाक अल्लाह की मुकद्दस किताब और हिदायत का खजाना है।कुरआन-ए-पाक इसलिए भेजा गया कि हम उसे पढ़ें, समझें और उसके मुताबिक अमल करें। रमजानुल मुबारक की सबसे अजीम नेमत कुरआन-ए-पाक है। कुरआन-ए-पाक चमकता हुआ आफताब है। इसकी एक-एक आयत में हिकमत के खजाने पोशीदा हैं। कुरआन-ए-पाक तारीखे इंसानी में वह इकलौती किताब है जिसने इंसान को दावत दी है कि वह गौरो फिक्र से काम लेकर समझने की कोशिश करे। अपने इर्द-गिर्द फैली हुई कायनात पर नजर डाले और मुआयना करे। कुरआन-ए-पाक पूरी मानवता के लिए मार्गदर्शक है, जो जीवन जीने के तरीके, नैतिकता, कानून और तौहीद का संदेश देता है। कुरआन-ए-पाक करीब 23 साल की मुद्दत में नाजिल हुआ।
अंत में दुरूद ओ सलाम पढ़कर मुल्क में आपसी भाईचारे व मुहब्बत की दुआ मांगी गई। कार्यशाला में हाफिज रहमत अली निजामी, मुजफ्फर हसनैन रूमी, आसिफ महमूद नक्शबंदी, अली अफसर, नेहाल अहमद नक्शबंदी, आसिफ, शीराज सिद्दीकी, शाबान, महबूब आलम, मुहम्मद आजम, अली सब्जपोश, नवेद आलम, महबूब अहमद, शहनवाज अहमद, रूशान, जावेद, हाजी सलीम, एडवोकेट मुहम्मद आजम, तारिक सामानी, इरफान, हाजी बदरुल, हाजी फैज अहमद, मुहम्मद उबैद रजा, अल्तमश सहित तमाम लोग मौजूद रहे।
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